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मगध प्राचीन भारत के 16 महाजनपदों में से एक था। यह आधुनिक बिहार राज्य के पटना और गया जिले में फैला हुआ था।महाजनपदों में मगध, कोसल, वत्स एवं अवन्ती सबसे अधिक शक्तिशाली राज्य थे। धीरे-धीर मगध ने अन्य तीन महाजनपदों को पराजित करके अपने साम्राज्य में मिला लिया। इसकी राजधानी गिरिव्रज (वर्तमान राजगीर) थी।

मगध के उत्थान के मुख्य कारण इस प्रकार है:

विस्तृत उपजाऊ मैदान,प्राकृतिक सुरक्षा,खनिज संसाधनों की उपलब्धता,व्यापार  में वृद्धि,वन क्षेत्र तथा हाथियों की उपलब्धता,कृषि  में लोहे के उपयोग,धान की रोपाई की पद्धति का विकास,कृषि में दासों और कर्मकारो को लगाया जाना,नवीन धर्मों का उदय
सामाजिक खुलापन व प्रगतिशील दृष्टिकोण

इस दौरान कृषि में लोहे के औज़ार उपयोग किये जाने से मगध में कृषि उत्पादन में काफी वृद्धि हुई। साथ ही साथ कृषि में नयी पद्धतियों का विकास भी हुआ। इसके फलस्वरूप कृषि उत्पादन आवश्कता से भी अधिक होने लगा।

मगध में शिल्प और उद्योग धंधों का विकास हुआ और वाणिज्य-व्यापार एवं मुद्रा अर्थव्यवस्था का विकास हुआ।

वदिक साहित्य में छठवीं शताब्दी ईसा पूर्व के दौरान के मगध साम्राज्य का उल्लेख मिलता है। छठवीं शताब्दी ईसा पूर्व में द्वितीय नगरीकरण भी शुरू हुआ है, जिससे राज्य निर्माण की प्रक्रिया को बल मिला। मगध साम्राज्य काल के बर्तनों से अनुमान लगाया जाता है कि इस दौरान नगर व्यवस्था अस्तित्व में थी।

इन मिट्टी के बर्तनों को उत्तरी काले चमकीले मृदभांड कहा गया है। राज्य को ठोस आर्थिक और सामाजिक आधार पर प्राप्त हुआ तथा करारोपण प्रणाली स्थापित हो गयी।

मगध साम्राज्य का सर्वप्रथम उल्लेख अथर्ववेद में किया गया है।बाद में गुप्त और मौर्य साम्राज्य के उत्थान भी मगध में हुआ था।

मगध में गणतांत्रिक व्यवस्था अस्तित्व में थी। इस दौरान ग्राम के प्रधान ग्रामक कहलाता था। वह न्यायायिक, सैन्य तथा कार्यकारी कार्य करता था।

इस दौरान धर्म, विज्ञान, ज्योतिष और दर्शन का अत्यधिक विकास हुआ।

  1. हर्यंक वंश (544-412 ईसा पूर्व)
  2. बिम्बिसार (544-492 ईसा पूर्व)
  3. अजातशत्रु (492-460 ईसा पूर्व)
  4. उदायिन (460-440 ईसा पूर्व)
  5. शिशुनाग वंश (412-344 ईसा पूर्व)
  6. नन्द वंश (344-323 ईसा पूर्व)

नन्द वंश के दौरान मगध साम्राज्य पूर्व में बंगाल से लेकर पश्चिम में पंजाब से विन्ध्य पर्वत श्रृंखला तक फैला हुआ था।

महापद्मानंद ने शिशुनाग वंश के अंतिम शासक महानन्दिन की हत्या करके नन्द वंश की नींव रखी। बौद्ध ग्रन्थ “महाबोधिवंश” में उसे उग्रसेन तथा पुरानों में सर्वक्षत्रान्तक एवं एकराट कहा गया है।

खारवेल के हथिगुम्फा अभिलेख में उसकी कलिंग विजय का उल्लेख है। महापद्मानंद ने पंचाल, कसीस, हैयाय, कलिंग, अस्मक, कुरु, मैथल, शूरसेन इत्यादि राज्यों को हराया।

महाबोधिवंश के अनुसार धनानंद इस वंश का अंतिम शासक था, जिसे ग्रीक लेखक अग्रमीज़ एवं जेन्द्रमीज़ कहते थे। उसकी कुरीतियों के कारण उसे मगध की जनता द्वारा अधिक पसंद नहीं किया जाता था।

इसके कार्यकाल के दौरान सिकंदर ने पश्चिम उत्तर भारत पर 326 ईसा पूर्व में आक्रमण किया था।

परशासनिक और आर्थिक व्यवस्था
मगध साम्राज्य प्राचीन भारत का पहला बड़ा साम्राज्य था। इस दौरान नौकरशाही रक्त सम्बन्ध से अलग थी। बलिसधक, शौलिकक, राज्जुग्राहक और अक्षपटलाधिकृत इस काल के प्रमुख अधिकारी थे। महाजनपदों के सैनिक दोधारी तलवारी और सरकंडे के बाणों के मुख पर लोहे की नोक लगाकर उपयोग करते थे।

इस दौरान धातुओं का उपयोग वृहत स्तर पर किया जाता था।

 

इस दौरान वास की भूमि और कृषि भूमि को अलग-अलग किया गया।

भमि माप की इकाई निवर्तन कहलाती थी। छठी सदी ईसा पूर्व में व्यवसायियों ने अपने-अपने संगठन बना लिए, जिसे श्रेणी कहा जाता था।

शरेणी एक ही कार्य करने वाले लोगों का समूह था, जिसका प्रमुख श्रेष्ठिन अथवा ज्येष्ठक कहलाता था।

सभवतः इस काल में विनिमय के लिए सिक्कों का उपयोग किया जाना आरम्भ हुआ। यह सिक्के सोने और चांदी से बने थे। इस काल के सिक्के आहत सिक्के थे। इस दौरान व्यापारिक गतिविधियों में भी वृद्धि हुई।

वयापार की वृद्धि के लिए पांड्य सिद्धि संस्कार किया जाता था ।

छठी शताब्दी ईसा पूर्व में गंगा-यमुना दोआब एवं बिहार के आस-पास के क्षेत्रों में द्वितीय नगरीय क्रान्ति हुई।

परारंभिक बौद्ध साहित्य में बुद्ध के समय के 6 प्रसिद्ध नगरों का उल्लेख मिलता है।

 

सोर्स : अज्ञात

By admin

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