व्यर्थ पड़ी सरकारी भूमि की समस्या

हमारे देश में जगह-जगह फैली सरकारी भूमि का हिसाब और उसकी कीमत के सही आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। सरकारी भूमि सूचना तंत्र (GLIS) द्वारा दी गई जानकारी अपूर्ण और बेतरतीब है। हालांकि अनेक मंत्रालय 13,50,500 हेक्टेयर सरकारी भूमि होने की बात कहते हैं, पर अलग-अलग सरकारी सूत्र बताते हैं कि वास्तविक भूमि इससे कई गुना अधिक है।

बेकार पड़ी भूमि से होने वाले नुकसान

सरकारी भूमि के अधिकांश भाग का अनुपयोगी पड़े रहना शोचनीय है। रेल एवं रक्षा मंत्रालय के पास कई हजार हेक्टेयर की भूमि बेकार पड़ी है। देश के 13 बड़े बंदरगाहों के अधीन भी बहुत सी भूमि है। इनके अलावा केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों के अलग-अलग विभागों के पास भी भूमि है। सरकार के पास संचित भूमि रहने के कुछ नुकसान देखने में आते हैं –

बेकार पड़ी भूमि में से कुछ तो ऐसे प्रमुख स्थानों पर है, जिनकी मार्केट वेल्यू बहुत अधिक है।इस प्रकार के भूमि संचय से शहरों में भूमि की कीमतें अनावश्यक रूप से बढ़ती जा रही हैं। संपत्ति दरों में सुधार और कम कीमत वाले मकानों की सरकारी नीति के बावजूद कम और मध्यम आय वाले लोगों के लिए शहरों में मकान खरीदना मुश्किल बना हुआ है।बेकार पड़ी भूमि का संबंध भ्रष्टाचार से भी है। मुंबई की आदर्श हाउसिंग सोसायटी, श्रीनगर की एयर फील्ड योजना, कांडला पोर्ट ट्रस्ट आदि के मामले बेकार पड़ी सरकारी भूमि के आवंटन से ही जुड़े हुए हैं।सार्वजनिक भूमि को गलत तरीके से निजी क्षेत्र को बेचने के मामले भी सामने आते रहते हैं

भूमि उपयोग –

भूमि सीमित है और उसका उपयोग सोच-समझकर किया जाना चाहिए। सरकारी एजेंसियों द्वारा भूमि का उपयोग अविवेकपूर्ण तरीके से किया जाता है।आर्थिक विकास एवं जनसंख्या के बढ़ते घनत्व के साथ भूमि की आवश्यकता भी बढ़ती जाती है। भूमि की क्षमता को बढ़ाने के लिए फ्लोर स्पेस इंडेक्स (FSI) में वृद्धि को ध्यान में रखा जाना बहुत जरूरी है। अक्सर इसका ध्यान नहीं रखा जाता। इस कारण से बड़़े-बड़े शहरों में भूमि की अधिक कमी होने लगती हैं। एफएसआई की सबसे अधिक दुर्दशा के उदाहरण सरकारी आवासों और कार्यालयों में देखी जा सकती है। यही कारण है कि अन्य विकासशील देशों की तुलना में भारत में एफएसआई सबसे कम है। दिल्ली व मुंबई की तुलना में शंघाई में एफएसआई चार गुना अधिक है।

अतिरिक्त भूमि का सदुपयोग –जल, कचरा-निष्पादन, सरकार द्वारा प्रायोजित आवास योजना एवं परिवहन आदि में अतिरिक्त भूमि का उपयोग किया जाना चाहिए।भविष्य में उपयोग के लिए सुरक्षित भूमि को पारदर्शी अनुबंधों के माध्यम से किराए पर दिया जा सकता है।भूमि के सदुपयोग के संबंध में ब्रिटेन से सीखा जा सकता है। वहाँ की सरकार भूमि के अधिकार, स्थिति एवं उपयोग के प्रयोजन को बहुत ही स्पष्ट रखती है। नागरिकों को सरकारी भूमि के उपयोग के संबंध में बोली लगाने एवं उसके वैकल्पिक उपयोग के लिए सुझाव देने हेतु आमंत्रित किया जाता है। अतः हमारी सरकार को भी इस संबंध में पारदर्शी होने की जरूरत है।

समय की मांग है कि सभी सरकारी विभागों के पास उपलब्ध भूमि एवं उसके उपयोग से जुड़ी व्यापक सूची तैयार की जाए। इसमें भूमि की स्थिति, नाम, अधिकार आदि का स्पष्ट विवरण हो। इसके बाद ही भूमि की स्थिति के अनुकूल उसके पर्याप्त-अपर्याप्त उपयोग एवं अतिरिक्त भूमि का आकलन किया जा सकेगा।

‘द हिन्दू’ में प्रकाशित राम सिंह के लेख पर आधारित

यह लेखक के अपने विचार है।

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