दैनिक समसामयिकी 26 December 2017

1.मानव तस्करी पर होगी और सख्त सजा
• मानव तस्करी जैसे अपराध पर अंकुश लगाने को सरकार कड़े प्रावधान करने जा रही है। इसके लिए एक अलग से कानून बनाने की कवायद चल रही है जिसमें एक लाख की पेनाल्टी के अतिरिक्त सात से दस साल की कड़ी सजा का प्रावधान होगा। कानून के मसौदे पर विचार करने को मंगलवार को मंत्रि समूह की बैठक भी प्रस्तावित है।
• ट्रैफिकिंग ऑफ पर्सन्स (प्रिवेंशन, प्रोटेक्शन एंड रिहैबिलिटेशन) एक्ट के नाम से बन रहे इस कानून में पीड़ितों खासतौर पर महिलाओं को नौकरी दिलाने के नाम पर वेश्यावृति में धकेलने जैसे कार्यो को भी मानव तस्करी के दायरे में शामिल करने पर विचार हो रहा है।
• इसके अतिरिक्त ऐसी सभी प्लेसमेंट एजेंसियों के लिए इस कानून के तहत पंजीकरण कराना आवश्यक होगा जो महिलाओं के लिए रोजगार उपलब्ध कराने का काम करती हैं। मसौदे में इस बात का भी प्रावधान किया जा रहा है कि जिस पीड़िता को वेश्यावृति के धंधे में धकेला जाता है उसे मानव तस्करी का शिकार माना जाए।
• अभी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। यह पहला मौका है जब देश में इस तरह का कानून बनाया जा रहा है। महिला एवं बाल विकास मंत्रलय की तरफ से तैयार इस कानून के मसौदे में दो बार बदलाव किया जा चुका है। संशोधित मसौदे पर मंगलवार को मंत्रियों का समूह विचार कर सकता है।
• मसौदे में एक एंटी ट्रैफिकिंग फंड बनाने का प्रस्ताव भी किया गया है, जिसका इस्तेमाल पीड़ितों के पुनर्वास के लिए किया जा सकेगा।
• दोषियों को कड़ी सजा के प्रावधान वाले इस कानून को जल्दी ही संसद में पेश किए जाने की संभावना है। सूत्र बताते हैं कि मौजूदा शीतकालीन सत्र में इसके सदन में आने की संभावना नहीं है, इसलिए अब इसके बजट सत्र में ही संसद में आने की उम्मीद है।
• मानव तस्करी पर रोक लगाने के उद्देश्य से मसौदे में जिला स्तर से लेकर राज्य स्तर पर देश भर में एंटी ट्रैफिकिंग कमेटियां गठित करने का उपाय किया गया है। केंद्र के स्तर पर एक केंद्रीय एंटी ट्रैफिकिंग एडवाइजरी बोर्ड के गठन का प्रस्ताव किया गया है। इसके अलावा पीड़ितों को तुरंत संरक्षण देने के उद्देश्य से देश भर में प्रोटेक्शन होम स्थापित करने का प्रावधान भी कानून में किया जा रहा है।
• पीड़ितों के स्थायी पुनर्वास के लिए राज्यों से ऐसी स्कीमें बनाने की अपेक्षा कानून में की गई है, जिससे मानव तस्करों के चंगुल से निकाली गई पीड़िताओं को पुनर्वासित कर सकें। भारत समेत दुनिया के तमाम देशों में मानव तस्करी एक बड़ी समस्या बनकर उभरी है।
• भारत के कुछ राज्य इस समस्या से ज्यादा प्रभावित हैं, लेकिन अब तक उन पर अंकुश के तमाम सरकारी उपाय नाकाफी साबित हुए हैं।

2. बैंक में लोगों के जमा पैसे की गारंटी पर आएगा नया कानून, ऐसा बोर्ड बनेगा जिसके फैसले को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती नहीं दी जा सकेगी
• बैंक में जमाकर्ता का पैसा कितना सुरक्षित रहेगा, यह विवाद का विषय बना हुआ है। वजह है फाइनेंशियल रिजॉल्यूशन डिपोजिट इंश्योरेंस (एफआरडीआई) बिल। यह डिपोजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन (डीआईसीजीसी) एक्ट की जगह लेगा।
• कहा जा रहा है कि इससे बैंक में जमाकर्ताओं का पैसा वापस मिलने की गारंटी नहीं रहेगी। उद्योग संगठन और बैंकर्स भी इसके खिलाफ हैं। हालांकि प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री कह चुके हैं कि पैसा पूरी तरह सुरक्षित है। बिल पर संसदीय समिति को शीत सत्र में सिफारिशें देनीं थीं, लेकिन इसे बजट सत्र तक का समय दे दिया गया है।
• विशेषज्ञों के मुताबिक वित्तीय ढांचा रिजर्व बैंक के बजाय सरकार के हाथों में जाएगा। इसमें विशेष बोर्ड बनाने का प्रावधान है। इसके फैसले को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती नहीं दी जा सकेगी। इसमें अध्यक्ष के अलावा आरबीआई, सेबी, इरडा, पीएफआरडीए और वित्त मंत्रालय के प्रतिनिधि, 3 होल-टाइम और 2 स्वतंत्र डायरेक्टर रहेंगे। यानी बोर्ड के 11 सदस्यों में से 7 को सरकार नियुक्त करेगी।
• कैबिनेट ने 14 जून को बिल को मंजूरी दी थी। मानसून सत्र में इसे लोकसभा में पेश किया गया। अभी यह संसद की संयुक्त समिति के पास है। समिति के एक सदस्य ने बताया कि बैंकर बिल को लेकर ज्यादा चिंतित हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इसके प्रावधानों से बैंक डूब जाएंगे।
• बैंक डूबने के कगार पर आता है तो उसे बचाने का मैकेनिज्म होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि बिल जी-20 के दबाव में नहीं लाया गया है।
• नए बिल के मुताबिक रिजॉल्यूशन कॉरपोरेशन क्या काम करेगा?
• यहबैंक और बीमा जैसी वित्तीय कंपनियों के जोखिम की मॉनिटरिंग करेगा। बैंक बंद होने की नौबत आती है तो उसका रिजॉल्यूशन प्लान बनाएगा।
• बेल-इनप्रावधान क्या है?
• वित्तीय कंपनी दिवालिया होने की नौबत आई तो उसकी एसेट-लायबिलिटी किसी और को दी जा सकती है, दूसरी कंपनी में विलय हो सकता है या कंपनी खत्म भी की जा सकती है। एक और प्रावधान है देनदारी की आंतरिक रिस्ट्रक्चरिंग का। इसी को बेल-इन कहते हैं।
• बेल-आउटसे कैसे अलग है बेल-इन?
• बेलआउटपैकेज में बाहर से पैसे देकर मदद की जाती है। यह करदाताओं का पैसा होता है। बेल-इन में जमाकर्ता के पैसे का इस्तेमाल होता है।
• बेल-इनमें क्या किया जाएगा?
• दो बातें हो सकती हैं। बैंक की देनदारी खत्म की जा सकती है या उसकी देनदारी को कर्ज या इक्विटी में बदला जा सकता है।
• इसेलेकर विवाद क्यों है?: विवादकी वजह है प्रायरिटी। यह इस तरह है- डिपोजिट इंश्योरेंस, सिक्योर्ड जमाकर्ता, कर्मचारियों का वेतन, अन-इन्श्योर्ड डिपोजिट, अन-सिक्योर्ड जमाकर्ता, सरकार का बकाया और शेयरहोल्डर।
• जमाकर्ता को शेयरहोल्डर बनाया तो वह पैसे लौटाने की प्राथमिकता में अंत में होगा। हालांकि इसके लिए उसकी सहमति लेनी पड़ेगी।
• अभी बेल-इन का प्रावधान नहीं है? :- नहीं।अभी बैंक फेल होने पर या तो उसका दूसरे बैंक में विलय होता है या बंद कर दिया जाता है।
• किसीऔर देश में है ऐसा कानून? :- वित्तीय संकट के बाद अमेरिका और यूरोप के इंग्लैंड और जर्मनी समेत कई देशों में इसका प्रावधान किया गया है।
• अबतक कहीं बेल-इन लागू हुआ है? :- 2013में साइप्रस में बेल-इन प्रावधान का इस्तेमाल किया गया था। तब जमाकर्ताओं को अपनी आधी रकम गंवानी पड़ी थी।

3. लाभ वाले उपक्रमों की भी बिक्री संभव
• सरकार वैसे तो अगले साल के दौरान घाटे वाले केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने की तैयारी कर रही है लेकिन विनिवेश होने वाले उपक्रमों की सूची में वह ऐसे कुछ लाभ कमाने वाले उपक्रमों को भी शामिल कर सकती है जिनका कोई रणनीतिक महत्व नहीं है। यह जानकारी एक शीर्ष सरकारी अधिकारी ने दी है।
• अधिकारी के अनुसार उपक्रमों को निजी क्षेत्र को सौंपने की प्रक्रिया जारी रहेगी। नीति आयोग को घाटे वाले उपक्रमों को बेचने की योजना बनाने का काम सौंपा गया है। लेकिन कुछ लाभ कमाने वाले उपक्रमों को भी बेचा जा सकता है। इनके लिए अच्छा खरीदार मिलने की संभावना होने पर यह कदम उठाया जाएगा। लाभ कमाने वाले उन्हीं उपक्रमों को बेचने पर विचार होगा जिनमें रणनीतिक दृष्टि से कोई दिलचस्पी नहीं है।
• नीति आयोग निजीकरण के लिए पहले ही 23 उपक्रमों की पहचान करके सिफारिश दे चुका है। अब निवेश एवं सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (दीपम) इन मामलों पर विचार कर रहा है। अधिकारी के अनुसार जल्दी ही विभाग इन्हें बेचने के लिए पहल कर सकता है।
• गौरतलब है कि प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने रणनीतिक विनिवेश के लिए उपक्रमों की पहचान करने का निर्देश दिया है। इसके लिए आयोग ने उपक्रमों को उच्च और निम्न प्राथमिकता की दो श्रेणियों में उपक्रमों को बांटा है। निम्न प्राथमिकता वाली सूची के उपक्रमों में रणनीतिक विनिवेश की कोशिश की जाएगी।
• सरकार चालू वित्त वर्ष में अब तक उपक्रमों के विनिवेश से 52500 करोड़ रुपये जुटा चुकी है। इनमें सूचीबद्ध सरकारी बीमा कंपनियां भी शामिल हैं।
• सरकार ने चालू वित्त वर्ष में विनिवेश के जरिये धन जुटाने में पिछले साल के आंकड़े को पीछे छोड़ दिया है। पिछले वित्त वर्ष में 45500 करोड़ रुपये जुटाए गए थे। हालांकि सरकार ने बजट में चालू वित्त वर्ष के दौरान 72500 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा था।

4. भारत-रूस में खेती के लिए सहयोग
• बदलते वैश्विक माहौल में भारत और रूस के बीच रिश्ते पहले जैसे गर्माहट वाले नहीं रहे लेकिन दोनो देश सहयोग के नए आयाम तलाश रहे हैं। इसमें कृषि ऐसा क्षेत्र है, जहां रिश्तों की नई कहानी लिखी जा सकती है। खास तौर पर रूस में खाली पड़े जमीन पर खेती कर भारत अपनी खाद्यान्न जरूरत को पूरी करने पर विचार कर रहा है।
• इस बारे में दोनों देशों के बीच पहले भी बात हुई है। वैसे चीन पहले ही रूस में पट्टे पर जमीन लेकर अपनी आबादी के लिए अनाज व फल-सब्जियां उपजा रहा है। इसी तर्ज पर भारत भी कुछ वर्षो बाद रूस की मदद ले सकता है।
• पिछले हफ्ते विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रूस के उप प्रधानमंत्री दिमित्री रोगोजिन के बीच हुई द्विपक्षीय बातचीत में कृषि एक अहम मुद्दा रहा है। बैठक में कृषि से जुड़े तमाम क्षेत्रों में सहयोग को प्रगाढ़ करने पर सहयोग देने के लिए एक समिति गठित की गई है।
• विदेश मंत्रलय के सूत्रों का कहना है कि कृषि और फार्मास्युटिकल्स दो ऐसे क्षेत्र हैं जो आने वाले दिनों में भारत व रूस के द्विपक्षीय रिश्तों को बिल्कुल नया आयाम देंगे। भारत व रूस के द्विपक्षीय रिश्ते अभी तक बहुत हद तक रक्षा व ऊर्जा तक ही सीमित हैं।
• दोनो देश अब दूसरे क्षेत्रों में विस्तार करना चाहते हैं। वैसे भी भारत अपनी रक्षा जरूरत के लिए अब दूसरे देशों पर रूस से भी ज्यादा निर्भर रहने लगा है।
• स्वराज और रोगोजिन के बीच हुई मुलाकात में इस संदर्भ में कई मुद्दों पर चर्चा हुई है जिसके आधार पर आने वाले दिनों में कदम उठाए जाएंगे
• भारत हाल के दिनों में अन्य देशों में भी खाद्यान्न उत्पादन कर अपनी जरूरत पूरी करने पर योजना पर गंभीर हुआ है। दो वर्ष पहले जब भारत में दाल का संकट हुआ था तब भारत ने म्यांमार, मोजाम्बिक और नामीबिया में दलहन उपजाने पर वहां की सरकारों से बात की थी।
• खाद्य तेल का उत्पादन दूसरे देशों में करने के लिए भी भारत इच्छुक है। इसके लिए थाईलैंड, मलेशिया और इंडोनेशिया के साथ चर्चा की जा रही है। लेकिन जानकार मान रहे हैं रूस के पास काफी खाली जमीन है और भविष्य में खाद्यान्न की भारी मांग को देखते हुए वहां खेती कर अनाज भारत लाने का तरीका एक बढ़िया नुस्खा हो सकता है।
• रूस खुद चीन को साइबेरिया और पूर्वी सीमा के राज्यों में कृषि में निवेश करने के लिए आकर्षित कर रहा है। रूस की जमीन कुछ खास तरह के कृषि उत्पादों के लिए काफी उपजाऊ है। भारत वहां खेती कर उत्पादों को घरेलू बाजार के लिए ला सकता है। पिछले वर्ष दोनों देशों के बीच कृषि स्तरीय अंतरमंत्रलयी आयोग की बैठक में भी इस बारे में चर्चा हुई थी।
• यह काम चीन पहले से ही रूस की पूर्वी सीमा पर कर रहा है। पिछले वर्ष संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत व चीन को आने वाले कुछ दशकों में अपनी जरूरत के कृषि उत्पादों का एक बड़ा हिस्सा दूसरे देशों में उपजाना पड़ेगा। बढ़ती आबादी, जमीन की उर्वरा शक्ति में हो रहे क्षरण आदि की वजह से भारत के लिए भी अपनी घरेलू जमीन से पूरी आबादी का पेट भरना मुश्किल होगा।
• इन दोनो देशों में बड़े पैमाने पर होने वाले औद्योगीकरण को भी एक कारण बताया गया था। दाल और खाद्य तेल उत्पादन में यह स्थिति अभी ही बन गई है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 60 फीसद खाद्य तेल बाहर से आयात कर रहा है। दलहन भी बड़े पैमाने पर आयात किया जाता रहा है।

5. अब ग्वाटेमाला भी इजरायल का अपना दूतावास यरुशलम में करेगा स्थानांतरित

• अमेरिका का अनुसरण करते हुए ग्वाटेमाला ने भी इजरायल का अपना दूतावास यरुशलम में स्थानांतरित करने का फैसला किया है। इजरायल ने ग्वाटेमाला के इस फैसले पर खुशी जताई है और वहां के राष्ट्रपति जिमी मोरेल्स के प्रति आभार जताया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूतावास स्थानांतरित करने के फैसले का दुनिया भर में विरोध हुआ है।
• ग्वाटेमाला अकेला देश है जिसने अमेरिका के कदम का समर्थन करते हुए अपना दूतावास यरुशलम ले जाने का फैसला किया है। ग्वाटेमाला के राष्ट्रपति मोरेल्स ने फेसबुक के जरिये बताया कि उन्होंने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से विचार-विमर्श के बाद दूतावास स्थानांतरित करने का फैसला किया है। फिलहाल ग्वाटेमाला का दूतावास भी इजरायल की मौजूदा राजधानी तेल अवीव में है।
• जवाब में इजरायली संसद के अध्यक्ष यूली एडेलस्टीन ने राष्ट्रपति मोरेल्स के साहसी फैसले की सराहना की है। कहा है कि आपने साबित कर दिया है कि ग्वाटेमाला इजरायल का सच्चा दोस्त है। ग्वाटेमाला में इजरायल के राजदूत मैटी कोहेन ने रेडियो पर दिए संदेश में कहा है कि दूतावास के स्थानांतरण के लिए अभी कोई तारीख निश्चित नहीं की गई है, लेकिन ग्वाटेमाला स्थानांतरण का कदम तभी उठाएगा जब अमेरिकी दूतावास तेल अवीव से यरुशलम स्थानांतरित हो जाएगा।
• संयुक्त राष्ट्र में भी किया था समर्थन : संयुक्त राष्ट्र महासभा में यरुशलम की स्थिति को लेकर पेश प्रस्ताव का ग्वाटेमाला और उसके पड़ोसी देश होंडूरास ने ही अमेरिका का साथ दिया है। कुल 193 देशों वाली इस महासभा में 128 देशों ने ट्रंप के फैसले से असहमति जताई है। असहमति जताने वाले देशों में ब्रिटेन, जापान और फ्रांस जैसे अमेरिका के मित्र राष्ट्र भी शामिल हैं। ग्वाटेमाला और होंडूरास अमेरिकी सहायता पाने वाले प्रमुख देश हैं।

6. दक्षिण कोरिया में आबादी को मिलेगा आराम का अधिकार
• दक्षिण कोरिया जल्द ही अपनी कामगार आबादी को आराम का अधिकार (राइट टू रेस्ट) की सौगात देने की तैयारी में है। दक्षिण कोरिया में लोग सालाना 2069 घंटे काम करते हैं।
• सरकार की कोशिश है कि लोग सप्ताह में सिर्फ 52 घंटे ही काम करें। काम के लंबे घंटों की वजह से कोरिया में जन्म दर और प्रजनन क्षमता में कमी के अलावा दूसरी कई सामाजिक समस्याएं सामने आने लगी हैं।
• तेज आर्थिक विकास के के लिए दक्षिण कोरिया में सप्ताह में 68 घंटे काम करने का चलन शुरु हुआ।
• ऑर्गनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) समूह के देशों में दक्षिण कोरिया दूसरा सबसे ज्यादा काम के घंटों वाला देश है।
• ओईसीडी देशो में पहले नंबर पर मैक्सिको है, यहां लोग सालाना 2 हजार 300 घंटे काम करते हैं।
• सबसे कम काम के घंटे जर्मनी में है, यहां लोग सालाना 1,371 घंटे ही काम करते हैं।
• भारत में एक हफ्ते में 48 घंटे ही काम करने का प्रावधान है।
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