पंचायतों से संबंधित महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान

भारत के संविधान के नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 40 में यह निर्देश है कि “राज्य ग्राम पंचायतों का संगठन करेगा और उनको एसी शक्तियाँ और प्राधिकार प्रदान करेगा जो उन्हें स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने के लिए आवश्यक हों. इस निर्देश के अनुसरण में भारत सरकार ने 73वें संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1992 द्वारा पंचायतों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया और भाग 9 में इसके लिए उपबंध किया है.
संविधान के भाग 9 में अनुच्छेद 243 के अंतर्गत त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के बारे में उपबंध किया गया है. इस पंचायती राज व्यवस्था के महत्वपूर्ण प्रावधानों का विवरण निम्नानुसार है.

ग्राम सभा:
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अनुच्छेद 243 में दी गयी परिभाषा के अनुसार किसी ग्राम पंचायत के पंचायती क्षेत्र में आने वाले गाँव/गाँवों में जितने लोग निर्वाचक नामावली में रजिस्ट्रीकृत हैं, उनका समूह ही ग्राम सभा कहलाता है. राज्य सरकार ग्राम सभा को विभिन्न शक्तियाँ और प्राधिकार प्रदान कर सकती है. ग्राम सभा, ग्राम पंचायत से भिन्न होती है और वास्तव में यही ग्राम पंचायत के सदस्यों का निर्वाचन करने वाला निर्वाचक मंडल होती है.

ग्राम पंचायत और तीनों स्तरों की पंचायतों की संरचना:
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अनुच्छेद 242ख में तीन स्तरीय पंचायतों की स्थापना का प्रावधान है. अर्थात प्रत्येक राज्य में ग्राम, मध्यवर्ती और जिला स्तर पर पंचायतें गठित की जायेंगी. अलग-अलग राज्यों में इनके नामों में भिन्नता भी है. जिस राज्य की जनसँख्या 20 लाख से अधिक नहीं है वहाँ मध्यवर्ती स्तर की पंचायत का गठन नहीं किया जा सकता.
किसी भी स्तर की पंचायत में स्थान प्रत्यक्ष निर्वाचन के द्वारा भरे जाते हैं और इसके लिए उस पंचायत क्षेत्र को उतने निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है जितने उस पंचायत में स्थान होते हैं. पंचायत का सदस्य चुने जाने ले लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष होना चाहिए. प्रत्यक्ष निर्वाचन के अतिरिक्त कुछ स्थान, यदि राज्य का विधानमंडल इस संबंध में उपबंध करता है तो, निम्न प्रकार से भरे जा सकते हैं, अर्थात –
1. ग्राम पंचायतों के मुखिया, मध्यवर्ती पंचायत के सदस्य हो सकेंगे और जहाँ मध्यवर्ती पंचायतें नहीं हैं वहाँ वो जिला पंचायत के सदस्य हो सकेंगे.
2. मध्यवर्ती पंचायत के मुखिया/अध्यक्ष, जिला पंचायत के सदस्य हो सकेंगे.
3. लोक सभा के सदस्य और विधानसभा के सदस्य भी उन मध्यवर्ती और जिला पंचायतों के सदस्य हो सकेंगे जो उनके संसदीय या विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र के भीतर पूर्णत: या भागत: आती हैं.
4. राज्य सभा और राज्य की विधानपरिषद के सदस्य उन मध्यवर्ती और जिला पंचायत के सदस्य हो सकेंगे जिनके क्षेत्रों में वे निर्वाचक के रूप में रजिस्ट्रीकृत हैं.
पंचायतों के अधिवेशन में सभी सदस्यों को मत देने का अधिकार होता है, चाहे वे निर्वाचित हों या किसी अन्य तरीके से सदस्य बने हों.
ग्राम पंचायतों में अध्यक्ष का निर्वाचन, राज्य सरकार द्वारा तय किये गए उपबंधों के अनुसार किया जाता है, जबकि मध्यवर्ती और जिला स्तर की पंचायतों में अध्यक्ष का निर्वाचन उनके सभी सदस्यों द्वारा अपने में से किया जाता है.

पंचायतों में स्थानों का आरक्षण:
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प्रत्येक स्तर की पंचायत में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित होते हैं. यदि राज्य सरकार को आवश्यक लगे तो वह अन्य पिछड़े वर्गों के लिए भी स्थान आरक्षित कर सकती है.
पंचायत के कुल स्थानों में से, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए उसी अनुपात में स्थान आरक्षित होते हैं जिस अनुपात में उस पंचायत क्षेत्र की जनसंख्या में उनकी संख्या है. उनके लिए आरक्षित इन स्थानों में से भी एक- तिहाई स्थान इन्हीं वर्गों की स्त्रियों के लिए आरक्षित होते हैं.
इसके अतिरिक्त, पंचायत के कुल स्थानों में से एक-तिहाई स्थान स्त्रियों के लिए आरक्षित होते हैं, लेकिन ध्यान रहे की स्त्रियों के लिए आरक्षित इस एक-तिहाई की गणना करते समय इसमें SC/ST की स्त्रियों के लिए आरक्षित स्थानों को भी शामिल किया जाता हैं.
SC/ST और स्त्रियों के लिए आरक्षित ये स्थान पूरे पंचायत क्षेत्र में विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों को प्रत्येक निर्वाचन के दौरान चक्रीय क्रम में विभाजित किये जाते हैं.
प्रत्येक स्तर की पंचायतों में अध्यक्षों के पदों की कुल संख्या के भी एक-तिहाई पद स्त्रियों के लिए, और SC/ST के लिए जनसंख्या में उनके अनुपात के अनुसार आरक्षित रहते हैं. ये पद भी विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों को चक्रीय क्रम में आबंटित किये जाते हैं.

पंचायतों का कार्यकाल:
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प्रत्येक पंचायत अपने प्रथम अधिवेशन की तारीख से पाँच वर्ष तक कार्य करती है और नयी पंचायत के लिए निर्वाचन इस कार्यकाल के समाप्त होने से पहले करा लिया जाता है.
लेकिन जहाँ कोई पंचायत अपना 5 साल का कार्यकाल समाप्त करने से पहले ही विघटित हो गयी हो वहाँ नयी पंचायत के लिए निर्वाचन इस प्रकार विघटन की तारीख से 6 महीने के अन्दर कराना होता है और इस प्रकार गठित नयी पंचायत, पिछली पंचायत के विघटन के बाद के बचे हुए कार्यकाल के लिए ही होती हैं.
परन्तु जहाँ किसी पंचायत का विघटन उस समय हुआ हो जब उसका कार्यकाल केवल 6 महीने का ही बचा हो, तब निर्वाचन इस बचे हुए कार्यकाल के लिए नहीं कराया जाता, अर्थात तब निर्वाचन के बाद गठित नयी पंचायत पाँच साल के लिए होती है, बशर्ते उसका बीच में ही किसी कारण विघटन न हो जाए.

पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व:
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राज्य का विधान मंडल पंचायतों को एसी शक्तियाँ और प्राधिकार प्रदान कर सकता है जो उन्हें स्वायत्त शासन की संस्थाओं के रूप में कार्य करने के लिए आवश्यक हैं. इसके अंतर्गत निन्मलिखित के संबंध में शक्तियाँ और उत्तरदायित्व शामिल होंगे, अर्थात –
1. आर्थिक विकास और सामजिक न्याय के लिए योजनायें बनाना, और
2. आर्थिक विकास और सामजिक न्याय की उन योजनाओं को कार्यान्वित करना जो उन्हें सौंपी जाएँ. इसके अंतर्गत 11वीं अनुसूची में शामिल विषयों से संबंधित योजनायें भी हैं. उल्लेखनीय है की 11वीं अनुसूची में कुल 29 विषय शामिल हैं.
उपरोक्त शक्तियों के अलावा राज्य सरकार पंचायतों को कुछ प्रकार के कर, शुल्क, पथकर, फीसें आदि भी लगाने, वसूलने और उन्हें खर्च करने का अधिकार प्रदान कर सकता है और राज्य की संचित निधि में से पंचायतों के लिए सहायता अनुदान का उपबंध कर सकता है.

पंचायतों के लिए वित्त आयोग:
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अनुच्छेद 243झ में उपबंध है कि राज्य का राज्यपाल प्रत्येक पांचवें वर्ष की समाप्ति पर वित्त आयोग का गठन करेगा जो पंचायतों की वित्तीय स्थिति की जाँच-पड़ताल करता हैं. यह वित्त आयोग, इस बारे में सिफारिश करता है की राज्य द्वारा वसूले जाने वाले करों का राज्य सरकार और पंचायतों के बीच कैसे बंटवारा हो और जो कर पंचायतों को दिए जाने हैं वे पंचायतों के विभिन्न स्तरों के बीच कैसे विभाजित किये जाएँ. आयोग, राज्य की संचित निधि में से पंचायतों के लिए सहायता अनुदान दिए जाने के लिए सिद्दांतों के बारे में और पंचायतों की वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए आवश्यक उपायों के बारे में भी सिफारिश करता है.
वित्त आयोग अपनी ये सिफारिशें राज्य के राज्यपाल को देता है और राज्यपाल इन सिफारिशों को राज्य के विधानमंडल के समक्ष विचार के लिए रखवाता हैं.
वित्त आयोग की संरचना, उसके सदस्यों की योग्यता और उनकी नियुक्ति रीति आदि का निर्धारण राज्य सरकार कानून बनाकर कर सकती है. आयोग को अपनी प्रक्रिया स्वयं निर्धारित करने की शक्ति होती है, और अपने कृत्यों के पालन में एसी अन्य शक्तियाँ होती हैं जो उसे राज्य सरकार विधि बनाकर प्रदान करे. यही वित्त आयोग नगरपालिकाओं के संबंध में भी इन्ही सभी कृत्यों का पालन करता है.
राज्य का विधान मंडल पंचायतों द्वारा लेखे रखे जाने और उन लेखाओं की संपरीक्षा करने के बारे में भी उपबंध कर सकता है.

पंचायतों के लिए निर्वाचन:
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पंचायतों के निर्वाचन के लिए निर्वाचन नामावली तैयार कराने और इन सभी निर्वाचनों के संचालन का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण राज्य निर्वाचन आयोग में निहित होता है. राज्य निर्वाचन आयोग में एक राज्य निर्वाचन आयुक्त होता है जो राज्य के राज्यपाल द्वारा नियुक्त किया जाता है.
राज्य निर्वाचन आयुक्त की सेवा शर्तें और पदावधि राज्य के विधानमंडल की विधि के अनुसार राज्यपाल द्वारा निर्धारित की जाती है. लेकिन राज्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से हटाने के आधार और रीति वही होती है जो उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश के लिए हैं. राज्य निर्वाचन आयुक्त की सेवा शर्तों में उसकी नियुक्ति के बाद अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता.
पंचायती राज्य व्यवस्था का विस्तार:
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पंचायती राज व्यवस्था के उपबंध संघराज्य क्षेत्रों को लागू होते हैं. किन्तु ये उपबंध अनुच्छेद 244 में उल्लिखित अनुसूचित क्षेत्रों और जनजाति क्षेत्रों में लागू नहीं होती. हालांकि संसद को इस उपबंध में कोई परिवर्तन करने की शक्ति है.

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