भूमंडलीकरण के उत्थान के सम्बंधित लेख

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, निवेश तथा सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से विश्व के विभिन्न देशों के बीच सामाजिक, सांस्कृतिक व आर्थिक अंतर्क्रिया व एकीकरण की प्रक्रिया को भूमंडलीकरण कहते हैं। इसका चरित्र बहुआयामी है। यह एक प्रक्रिया के साथ ही एक अवधारणा भी है। इसे अन्य नामों, जैसे- वैश्वीकरण, उदारीकरण, बाज़ार-अर्थव्यवस्था या एक विश्वग्राम की परिकल्पना के तौर पर भी जाना जाता है। भारत जैसे अन्य विकासशील तथा तीसरी दुनिया के देशों पर भूमंडलीकरण का प्रभाव प्रत्यक्ष तथा परोक्ष दोनों रूपों में पड़ा है। सिद्धांततः उपभोक्तावादी संस्कृति उत्पादन प्रक्रिया के विकास में सहायक होती है, परंतु यह तर्क पश्चिमी विकसित पूंजीवादी देशों पर सही बैठता है। भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों में जहाँ साम्राज्यवाद ने उत्पादन का बुनियादी ढाँचा ही तोड़ दिया है, जहाँ उत्पादन प्रक्रिया में तेज़ विकास की ज़रूरत है , वहाँ उपभोक्तावाद ने विकास की संभावनाओं को क्षीण कर दिया है। पश्चिमी देशों के संपर्क से इन देशों में एक नए अभिजात वर्ग का जन्म हुआ है, जिसने उपभोक्तावादी संस्कृति को अपना लिया है। इस वर्ग में भी उन वस्तुओं को पाने की होड़ लग गई, जो पश्चिमी देशों के विकसित समाज को उपलब्ध थीं। इन वस्तुओं की उपलब्धि को सामाजिक प्रतिष्ठा से भी जोड़ दिया गया। अतः इस वर्ग की नकल करते हुए मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग में भी इन संसाधनों को पाने की उत्कट अभिलाषा जाग गई। भारत जैसे देश में यही अभिजात वर्ग राजनीति के शीर्ष पर विद्यमान रहा है, परिणामस्वरूप देश के संसाधनों का प्रयोग आम लोगों की आवश्यकता की वस्तुओं के निर्माण की जगह इस उपभोक्तावादी वर्ग की ज़रूरत पूरी करने वाली वस्तुओं और सुविधाओं के निर्माण में हो रहा है। ये उद्योग पूंजी प्रधान हैं, इनके कारण विदेशों पर हमारी निर्भरता बढ़ती है और गैर-ज़रूरी मशीनों और तकनीकों के आयात से मुद्रा की हानि होती है। इन वस्तुओं के उत्पादन से प्राकृतिक संसाधनों पर अनावश्यक बोझ बढ़ा है और पर्यावरण की अपूरणीय क्षति हुई है।भारत जैसे देशों में उपभोक्तावाद व्यापक गरीबी के बीच लग्ज़री वस्तुओं की होड़ को बढ़ाता है। चूँकि इन वस्तुओं का उपार्जन प्रतिष्ठा का आधार है, अतः इन्हें पाने की लालसा ने भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है। उपभोक्तावादी संस्कृति ने भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और संस्कृति को भी नुकसान पहुँचाया है। अब संपन्न ग्रामीण लोगों में भी उन वस्तुओं के प्रति आसक्ति पनप गई है, जो वस्तुएँ उपभोक्तावादी संस्कृति की देन हैं। उनका अतिरिक्त धन जो पहले सेवा कार्यों में खर्च हुआ करता था, उपभोक्तावाद के चलते अब वो निजी दिखावे में खर्च हो रहा है। समाज के नैतिक मानकों में गिरावट व दैनिक जीवन में तनाव में वृद्धि भी उपभोक्तावाद के कुछ अन्य परिणाम हैं। भूमंडलीकरण ने निश्चित तौर पर मांग और उत्पादन में वृद्धि की है, जिसके कारण रोज़गार भी बढ़े हैं। तकनीकी विकास भी भूमंडलीकरण का एक सकारात्मक परिणाम है, लेकिन इसी से ही जन्मे उपभोक्तावाद ने भूमंडलीकरण के लाभों को क्षीण कर दिया है। भूमंडलीकरण को मानवीय स्वरूप प्रदान किये जाने की आवश्यकता है। इसके लिये मानव समाज को अति उपभोग और अनावश्यक संग्रह की जीवन-शैली का त्याग करना होगा।

(साभार : अमित सिंह, अमित सिंह एक युवा इंजिनियर और प्रतियोगी परीक्षाओ के विशेषज्ञ है )

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