विजय नगर साम्राज्य

विंध्याचल के दक्षिण का भारत 200 वर्षों से अधिक समय तक विजयनगर और बहमनी राज्यों के प्रभुत्व में रहा। उन्होंने न केवल क़ानून और व्यवस्था बनाये रखी, बल्कि व्यापार तथा हस्तशिल्प का विकास भी किया। कला और साहित्य को प्रोत्साहन दिया तथा अपनी राजधानियों को सुन्दर बनायां उत्तर भारत में जबकि विघटनकारी शक्तियाँ धीरे-धीरे विजयी हुईं, दक्षिण भारत में लम्बे समय तक स्थिर शासन रहे। इस स्थिरता का अन्त पंद्रहवीं शताब्दी के अन्त में बहमनी साम्राज्य के विघटन से और उसके पचास वर्षों के बाद 1565 की राक्षस-टंगड़ी की लड़ाई में पराजय के बाद विजयनगर साम्राज्य के टूटने से हुआ। इस बीच भारत की परिस्थितियों में पूर्णतः परिवर्तन हो गया। यह परिवर्तन पहले समुद्री मार्ग से यूरोपीयों (पुर्तग़ाल) के आगमन के कारण और फिर उत्तर भारत में मुग़लों के आक्रमण और विजय के कारण हुआ। मुग़लों के आगमन से उत्तर भारत में एकता के सूत्र एक बार फिर पनपे पर साथ ही भूमि आधारित एशियाई शक्तियों और समुद्र पर प्रभुत्व रखने वाली यूरोपीय शक्तियों के मध्य एक लम्बे संघर्ष के युग का भी सूत्रपात हुआ।
वियजनगर साम्राज्य की स्थापना पाँच भाईयों वाले परिवार के दो सदस्यों हरिहर और बुक्का ने की थी। कंवदंतियों के अनुसार वे वारंगल क ककातीयों के सामंत थे और बाद में आधुनिक कर्नाटक में काम्पिली राज्य में मंत्री बने थे। जब एक मुसलमान विद्रोही को शरण देने पर मुहम्मद तुग़लक़ ने काम्पिली को रौद डाला, तो इन दोनों भाईयों को भी बंदी बना लिया गया था। इन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया और तुग़लक ने इन्हें वहीं विद्रोहियों को दबाने के लिए विमुक्त कर दिया। तब मदुरई के एक मुसलमान गवर्नर ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया था और मैसूर के होइसल और वारगंल के शासक भी स्वतंत्र होने की कोशिश कर रहे थे। कुछ समय बाद ही हरिहर और बुक्का ने अपने नये स्वामी और धर्म को छोड़ दिया। उनके गुरु विद्यारण के प्रयत्न से उनकी शुद्धि हुई और उन्होंने विजयनगर में अपनी राजधानी स्थापित की। हरिहर के राज्यारोहण का समय 1336 निर्धारित किया गया है। शुरू में, इस नये राज्य को मैसूर के होयसल राजा और मदुरई के सुल्तान का मुक़ाबला करना पड़ा। मदुरई का सुल्तान महत्वाकांक्षी था। एक लड़ाई में उसने होयसल राजा को हरा दिया और उसे बर्बर तरीक़े से मार डाला। होइसल राज्य की पराजय के बाद हरिहर और बुक्का को अपनी छोटी-सी रियासत के विस्तार का मौक़ा मिला। होयसल का सारा प्रदेश 1346 तक विजयनगर के अधिकार में आ गया। इस लड़ाई में हरिहर और बुक्का के भाईयों ने उनकी मदद की थी और उन्होंने अपने सम्बन्धियों के साथ मिलकर जीते हुए प्रदेश का प्रशासन सम्भाल लिया। इस प्रकार, प्रारम्भ में विजयनगर साम्राज्य एक प्रकार का सहकारी शासन था। बुक्का ने अपने भाई को उत्तराधिकारी बनाकर 1356 में और उसने 1377 तक राज्य किया।
साम्राज्य का विस्तार
विजयनगर की सैन्य शक्ति क्रमशः बढ़ रही थी और इसी विस्तार के कारण उसे दक्षिण और उत्तर दोनों ओर संघर्ष करना पड़ा। दक्षिण में उनके प्रमुख शत्रु मदुरई के सुल्तान थे। मदुरई और विजयनगर के बीच लगभग चार दशकों तक युद्ध की स्थिति बनी रही। मदुरई सुल्तान को 1377 तक मिटा दिया गया। उसके बाद विजयनगर साम्राज्य में तमिल प्रदेश और चेरों (केरल) के प्रदेश सहित रामेश्वरम तक सारा दक्षिण भारत सम्मिलित रहा। बहमनी राज्य की स्थापना 1347 में हुई थी। इसका संस्थापक एक महत्वाकांक्षी अफ़ग़ान ‘अलाउद्दीन हसन’ (अलाउद्दीन बहमन शाह प्रथम) था। उसने एक ब्राह्मण गंगू की सेवा में रहकर शक्ति बढ़ाई थी। इसलिए उसे ‘हसन गंगू’ कहा जाता है। राज्यारोहण के बाद उसने ‘अलाउद्दीन हसन बहमन शाह’ की उपाधि धारण की। कहा जाता है कि वह अपने को अर्द्ध-पौराणिक ईरानी योद्धा का वंशज मानता था, जिसका नाम था ‘बहमनशाह’। किन्तु लोकश्रुतियों के अनुसार बहमनशाह उसके ब्राह्मण आश्रयदाता के प्रति आदर का प्रतीक था। उसके पीछे तथ्य कोई भी हो, यह निश्चित है कि इस उपाधि के कारण राज्य को बहमनी साम्राज्य कहा गया।
विजयनगर के राजवंश

विजयनगर साम्राज्य पर जिन राजवंशों ने शासन किया, वे निम्नलिखित हैं-
संगम वंश – 1336-1485 ई.
सालुव वंश – 1485-1505 ई.
तुलुव वंश – 1505-1570 ई.
अरविडु वंश – 1570-1650 ई.

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