निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है:सुप्रीम कोर्ट

24.08.2017

24 अगस्त 2017 को देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने निजता का मौलिक अधिकार है या नहीं (राइट टू प्राइवेसी) मामले की सुनवाई करते हुए एक एैतिहासिक फैसला सुनाते हुये कहा कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है जिसको अदालत ने संविधान की धारा 21 (जीने के अधिकार) के तहत रखा है। निजता का मौलिक अधिकार मामले की सुनवाई नौ जजों वाली एक बेंच पर रखा गया था जिसे सर्वसम्मति से फैसला दिया गया। सुप्रीम कोर्ट में कर्नाटक हाईकोट के पूर्व न्यायधीश के एस पुत्तास्वामी ने वर्ष 2012 में आधार स्कीम को चुनौती देते हुए एक याचिका दाखिल की थी जिसमें यह याचिका की गई थी कि आधार स्कीम से इंसान के निजता और समानता के मौलिक अधिकार का हनन होता है। इसके अलावा कई अन्य याचिकाकर्ताओं ने याचिका दायर की जिसमें बी विल्सन, अरूणा रॉय और निखिल डे भी हैं। इनके द्वारा याचिका में मांग की गई कि संविधान में प्रदत्त अन्य मालिक अधिकारों की तरह ही निजता के अधिकार को भी दर्जा प्रदान किया गया हैं।

इस मामले की सुनवाई के 9 जजों वाली एक बेंच में किया गया जिसकी अध्यक्षता प्रमुख न्यायधीश जे एस खेहर कर रहे थे। इसके अलावा अन्य न्यायधीश चेलामेश्वर, न्यायधीश एसए बोबडे, न्यायधीश आरके अग्रवाल, न्यायधीश आरएफ नरीमन, न्यायधीश एएम सप्रे, न्यायधीश डी वाई चन्द्रचूंड़, न्यायधीश एसके कौल, न्यायधीश अब्दुल नजीर शामिल थे। मामले की सुनवाई में न्यायधीशों ने निजता के अधिकार को कई प्रकार से व्यक्त किया है जिसमें पहला आंतरिक जोन जिसमें शादी, बच्चे पैदा करना इत्यादि शामिल है दूसरा व्यक्तिगत जोन, जिसमें व्यक्ति द्वारा दिया गया किसी विशेष उद्देश्य से कोई भी डाटा बैंक उसी उद्देश्य हेतु प्रयोग करे अन्य किसी को डेटा प्रदान न करे। तीसरा पब्लिक जोन, इसमें व्यक्ति की शारीरिक मानसिक निजता बरकरार रहती है और अगर कोई किसी भी व्यक्ति से ऐसा सवाल पूछता है जिससे उसके मान सम्मान को ठेंस पहुॅंचता है तो वह निजता अधिकार का मामला माना जायेगा।

सम्बन्धित प्रश्नोत्तर

प्रश्न.1 सुप्रीम कोर्ट के अनुसार कौन सा मौलिक अधिकार है?

क. निजता

ख. लड़ाई झगडे

ग. उकसाने

घ. विदेश जाने

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