अनुच्छेद 35A से संबंधित तर्क और जानकारी

17 जुलाई, 2017 को सुप्रीम कोर्ट के 2-न्यायाधीश खंडपीठ द्वारा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 35 ए की वैधता पर फैसला करने के लिए एक जनहित याचिका का उल्लेख किया गया था और इसके लिए छह सप्ताह की समय सीमा निर्धारित की गई थी. जम्मू और कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 35 ए और अनुच्छेद 370 के प्रावधान पूरे देश में बहस का मुद्दा बना हुआ है.
अतः इस इस पृष्ठभूमि में अनुच्छेद 35 ए के प्रावधानों और उसके पक्ष विपक्ष के तर्कों को समझना अति आवश्यक है.
*भारतीय संविधान के अनुच्छेद 35 ए का प्रावधान*
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 35 ए के अनुसार ‘इस संविधान (भारतीय संविधान) में अंतर्विश्ट किसी के बात के होते हुए भी, जम्मू कश्मीर राज्य में प्रवृत्त ऐसी कोई विद्यमान विधि और इसके पश्चात राज्य के विधान मण्ड़ल द्वारा अधिनियमित ऐसी कोई विधि. (क) जो उन व्यक्तियों के वर्गो को परिभाषित करती है, जो जम्मू-कश्मीर राज्य के स्थायी निवासी हैं या होंगें या (ख) जो. राज्य सरकार के अधीन नियोजन, संपत्ति का अर्जन, राज्य में बस जाने या छात्रवृत्तियों के या ऐसी अन्य प्रकार की सहायता के जो राज्य सरकार प्रदान करें, या अधिकार, की बावत ऐसे स्थायी निवासियों को कोई विशेष अधिकार या विषेशाधिकार प्रदान करती है, या अन्य व्यक्तियों पर कोई निर्बन्धन अधिरोपित करती है, इस आधार पर पुष्टि नही होगी कि वह इस भाग (3) के किसी उपबंध द्वारा भारत के अन्य नागरिकों को प्रदत्त किन्हीं अधिकारों से असंगत है या उनको छीनती या न्यून करती है’.
इस अनुच्छेद को भारत के राष्ट्रपति के आदेश से संविधान (जम्मू और कश्मीर के लिए आवेदन) आदेश, 1954 के माध्यम से जोड़ा गया था. इस आदेश को धारा 370 के खंड (1) द्वारा प्रदत्त शक्तियों के तहत 14 मई 19 54 को तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने जारी किया था.
संक्षेप में यह अनुच्छेद राज्य के “स्थायी निवासियों” को परिभाषित करने के लिए जम्मू और कश्मीर राज्य की विधानमंडल को अधिकार देता है और रोजगार, संपत्ति, छात्रवृत्ति आदि के अधिग्रहण के मामले में इन स्थायी निवासियों को विशेष अधिकार और विशेषाधिकार प्रदान करता है.
*पृष्ठभूमि*
अनुच्छेद 35 ए के प्रावधानों की उत्पत्ति 1927 में हुई जब जम्मू के डोगरा ने इस डर से कि पंजाब के लोगों के आने से सरकारी सेवाओं में उनका नियंत्रण होगा, महाराजा हरि सिंह से संपर्क किया था.इन आशंकाओं से हरि सिंह ने 1927 और 1932 में अधिसूचना जारी की, जिसमें राज्य के विषय और उनके अधिकारों को परिभाषित किया गया.जम्मू और कश्मीर का संविधान, जो 1956 में तैयार किया गया था, ने 1927 और 1932 के अधिसूचनाओं में वर्णित स्थायी निवासियों की परिभाषा को बरकरार रखा.
1954 के राष्ट्रपति के आदेश ने एक रूपरेखा प्रदान की जिसमें अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर और केंद्र सरकार के बीच शक्तियों के विभाजन के लिए भारतीय संविधान में अनुछेद 35 ए को शामिल किया गय था. इसके बाद स्थायी निवासी को परिभाषित किया गया था – एक व्यक्ति जो पैदा हुआ था या 19 11 से पहले जम्मू-कश्मीर में बसे, या राज्य में संपत्ति अधिग्रहण के 10 सालों के बाद राज्य में निवासी रहे हैं.
2014 में एक गैर सरकारी संगठन ‘वी द सिटिज़ंस’ ने सर्वोच्च न्यायालय में अनुच्छेद 35 ए को हटाने की मांग करते हुए एक याचिका दायर की थी क्योंकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करके इसे संविधान में शामिल नहीं किया गया था.
जवाब में जब जम्मू-कश्मीर सरकार ने एक प्रति-शपथ पत्र दायर किया और याचिका को बर्खास्त करने की मांग की तो केंद्र सरकार ने ऐसा नहीं किया. इसी तरह दो कश्मीरी महिलाओं ने जम्मू-कश्मीर के खिलाफ भेदभाव को लेकर अनुच्छेद 35 ए के खिलाफ 2017 में सर्वोच्च न्यायालय में एक और मामला दायर किया.
जुलाई 2017 में एक हालिया सुनवाई में अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि केंद्र सरकार इस मामले में हलफनामा दाखिल करने की इच्छुक नहीं थी, बल्कि सरकार इस विषय पर एक ‘बड़ा बहस’ चाहती थी.
इसके बाद, सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले को तीन न्यायाधीशों की पीठ में भेजा और मामले के अंतिम निपटान के लिए छह सप्ताह का समय निर्धारित किया, जो जम्मू और कश्मीर में विवाद का एक कारण बना हुआ है.
*अनुच्छेद 35 ए के विरुद्ध तर्क*
अनुच्छेद 35 ए के विरुद्ध निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं.
• इसमें संविधान में अनुच्छेद 368 के तहत भारत के संविधान में संशोधन के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था. इसलिए, यह संविधान में संशोधन सहित कानून द्वारा स्थापित संवैधानिक प्रक्रियाओं का उल्लंघन करता है. यह संसद का एकमात्र कार्य है,कार्यकारिणी का नहीं.
• अनुच्छेद 35 ए द्वारा समर्थित स्थायी निवासी वर्गीकरण संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है, जो कानून के समक्ष समानता का मौलिक अधिकार प्रदान करता है. अनुच्छेद 35 ए मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है क्योंकि जम्मू और कश्मीर के स्थायी निवासियों के समान,अनिवासी भारतीय नागरिकों को अधिकार और विशेषाधिकार नहीं मिल सकते हैं.
• इस अनुच्छेद के तहत राज्य विधानमंडल द्वारा पारित संकल्प उन पुरूषों के बच्चों को उत्तराधिकार के अधिकार प्रदान करते हैं, जो अस्थायी निवासी महिलाओं से विवाह कर रहे हैं, लेकिन महिलाओं के बच्चों को उसी स्थिति में इनकार करते हैं. यह एक औरत के अधिकार ‘उसकी पसंद के एक आदमी से शादी करने’ की स्थिति का सीधा उल्लंघन है. यदि जम्मू-कश्मीर की महिला जम्मू-कश्मीर के एक गैर-स्थायी निवासी से शादी करती है, तो उनके उत्तराधिकारी संपत्ति के अधिकारी नहीं होते हैं.
• संपत्ति, रोजगार आदि से जुड़े प्रतिबंधों के कारण एंटरप्रेन्योर और प्रोफेशनल्स यहाँ जाने में रूचि नहीं रखते जो इस स्थान के सामाजिक विकास में मुख्य बाधा है.
*अनुच्छेद 35 ए के पक्ष में तर्क*
अनुच्छेद 35 ए के पक्ष में निम्नांकित तर्क दिए जा सकते हैं –
• संवैधानिक विशेषज्ञों के अनुसार, विभिन्न भारतीय राज्यों के संबंध में संविधान के विभिन्न लेख हैं, जिनमें विशेष प्रावधान (अनुच्छेद 371 और अनुच्छेद 371 ए-1 ) शामिल हैं. इसके अलावा, अनुच्छेद 370 मूल संविधान का हिस्सा है और इसलिए, अनुच्छेद 35 ए इससे भी सम्बन्धित है.
• अनुच्छेद 35 ए जम्मू और कश्मीर राज्य की जनसांख्यिकीय स्थिति को अपने निर्धारित संवैधानिक रूप में संरक्षित करना चाहता है.
• भारत के संविधान के अनुच्छेद 35 ए, किसी भी स्थिति में राज्य के लिए कुछ नया करने की कोशिश नहीं करता. यह केवल भारत के संविधान और जम्मू और कश्मीर के संविधान के बीच पहले से ही विद्यमान संबंधों को स्पष्ट करता है.
• छह दशकों में भारत के राष्ट्रपति ने 41 संवैधानिक आवेदन आदेश जारी किए जो कि भारतीय संविधान के विभिन्न प्रावधानों के तहत जम्मू और कश्मीर के साथ लागू होते हैं, जिसमें संघ द्वारा चुने गए राज्यपाल की जगह निर्वाचित सदा-ए-रियासत को दिया जाता जाता है. यदि सर्वोच्च न्यायालय का मानना है कि अनुच्छेद 35 ए संविधान का उल्लंघन करता है, तो इस तरह के फैसले को 1950 से लेकर सभी संवैधानिक आवेदन आदेशों तक लागू किया जाना चाहिए.
*निष्कर्ष*
जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है. इस राज्य को ऐतिहासिक और भौगोलिक कारकों से देश के राजनीतिक क्षेत्र में एक विशेष स्थिति प्राप्त है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 इस समझ को कानूनी तौर पर समर्थन देता हैं और भारतीय संविधान एवं जम्मू और कश्मीर के संविधान के बीच एक पुल की तरह काम करता है. अनुच्छेद 35 ए पर वर्तमान विवाद यद्यपि अप्रत्यक्ष रूप से जम्मू और कश्मीर के बारे में केन्द्र-राज्य संबंधों को संचालित करने वाले कुछ मूलभूत पहलुओं को उजागर कर रहा है. इस मुद्दे पर सही निर्णय के लिए संविधान के संरक्षक के रूप में न्यायपालिका सही मंच है.

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