PCS Mains – समाज-कार्य क्या है ?

समाज-कार्य क्या है ??

समाज-कार्य एक शैक्षिक एवं व्यावसायिक विधा है जो सामुदायिक सगठन एवं अन्य विधियों द्वारा लोगों एवं समूहों के जीवन-स्तर को उन्नत बनाने का प्रयत्न करता है।
सामाजिक कार्य का अर्थ है सकारात्मक और सक्रिय हस्तक्षेप से लोगों और उनके सामाजिक माहौल के बीच जीवन क्रिया को प्रोत्साहित करके व्यक्तियों की क्षमताओं को बेहतर करना जिससे  वे अपनी जीवन के आवश्यकताओं को पूरा करते हुए अपनी कष्टों को कम या समाप्त  कर सकें।

समाजकार्य और समाजशास्त्र में अंतर

समाजकार्य का अधिकांश भाग  समाजशास्त्रीय सिद्धांतों से लिया गया है, परन्तु समाजशास्त्र  मानव-समाज और मानव-संबंधों के सैद्धांतिक पक्ष का अध्ययन करता है, और  समाजकार्य इन संबंधों में आने वाले अंतरों एवं सामाजिक परिवर्तन के कारणों की खोज क्षेत्रीय स्तर पर करने के साथ-साथ व्यक्ति के मनोसामाजिक पक्ष का भी अध्ययन करता है

समाजकार्य के प्रकार !

समाजकार्य वैयक्तिक आधार पर, समूह अथवा समुदाय में व्यक्तियों की सहायता करने की एक प्रक्रिया है, जिससे व्यक्ति अपनी सहायता स्वयं कर सके। अतः तीन मुख्य भागों में बांटा गया है –

(1) वैयक्तिक समाजकार्य  – इस प्रक्रिया के माध्यम से एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की सहायता वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में उत्पन्न उसकी समस्याओं के समाधान के लिए  करे  जिसमें वह सेवार्थी ,संतोषपूर्ण जीवन व्यतीत कर सके।

(2) सामूहिक समाजकार्य  – विधि , जिसके माध्यम से किसी सामाजिक समूह के सदस्यों की सहायता एक कार्यकर्ता द्वारा की जाती है, जिससे वे व्यक्ति की प्रगति एवं समूह के लक्ष्यों की प्राप्ति में योगदान कर सकें।

(3) सामुदायिक संगठन – वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक संगठनकर्ता की सहायता से एक समुदाय के सदस्य को समुदाय और लक्ष्यों से अवगत होकर, उपलब्ध साधनों द्वारा उनकी पूर्ति आवश्यताओं के निमित्त सामूहिक एवं संगठित प्रयास करते हैं।

इंग्लैण्ड और संयुक्त राज्य अमेरिका में पहले चर्च के माध्यम से ही जन-कल्याणकारी कार्य किये जाते थे। इंग्लैण्ड में 1536 में एक कानून बना जिसमें निर्धनों की सहायता के लिए कार्य-योजना बनायी गयी। अट्ठारहवीं सदी में औद्योगिक क्रांति के बाद इंग्लैण्ड और अमेरिका में सरकारों द्वारा निर्धनों व अशक्तों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए कई कानूनों का निर्माण किया गया। व्यक्तियों का मनोसामाजिक पक्ष सुधारने हेतु 1869 में लंदन चैरिटी संगठन तथा अमेरिका में 1877 में चैरिटी ऑर्गनाइजेशन सोसाइटी ने पहल ली। भारत में भी समाज-कल्याण हेतु राजाओं द्वारा दान देने का चलन था, यज्ञ करवाये जाते थे एवं धर्मशालाओं इत्यादि का निर्माण होता था। औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप होने वाले सुधार कार्यक्रमों ने भारतीयों को प्रभावित किया और ईश्वरचंद विद्यासागर तथा राजा राममोहन राय आदि के प्रयासों द्वारा विधवा विवाह प्रारम्भ हुआ और सती प्रथा पर रोक लगी1905 में गोखले ने सर्वेंट्स ऑफ़ इण्डिया की स्थापना करके स्नातकों को समाज सेवा के लिए प्रशिक्षण देना प्रारम्भ किया। 1936 में भारत में समाज-कार्य के शिक्षण एवं प्रशिक्षण हेतु बम्बई में सर दोराब जी टाटा ग्रेजुएट स्कूल ऑफ़ सोशल वर्क की स्थापना हुई।

समाजकार्य के लिए स्कीम या योजनायें –

विधवा पेंशन , गरीब आर्थिक मदद,  छात्रवृत्ति योजनाये , कौशल विकास मिशन, विकलांग पेंशन , वृद्धावस्था पेंशन

प्रमुख समाजसेवी –

महात्मा गाँधी, राजा राम मोहन राय , इश्वर चन्द्र विद्यासागर , अण्णा हजारे, बाबा आम्टे, विनोबा भावे, आदि