चोल राजवंश VERY Short Description Series -2

चोल राजवंश

  • चोल साम्राज्य की स्थापना विजयालय ने की, जो आरम्भ में पल्लवों का एक सामंती सरदार था।
  • उसने 850 ई. में तंजौर को अपने अधिकार में कर लिया और पाण्ड्य राज्य पर चढ़ाई कर दी।
  • चोल 897 तक इतने शक्तिशाली हो गए थे कि, उन्होंने पल्लव शासक को हराकर उसकी हत्या कर दी और सारे टौंड मंडल पर अपना अधिकार कर लिया।
  • चोल  प्राचीन भारत का एक राजवंश था।
  • चोल साम्राज्य का अभ्युदय नौवीं शताब्दी में हुआ और दक्षिण प्राय:द्वीप का अधिकांश भाग इसके अधिकार में था।
  • चोल शासकों ने श्रीलंका पर भी विजय प्राप्त कर ली थी और मालदीव द्वीपों पर भी इनका अधिकार था।

 

वंश क्रम

विजयालय (850-870-71 ई.) प्रथम शासक
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राजराज प्रथम (985-1014) ने चोल वंश की प्रसारनीति को आगे बढ़ाते हुए अपनी अनेक विजयों द्वारा अपने वंश की मर्यादा को पुन: प्रतिष्ठित किया।
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राजराज ने पश्चात् उनके पुत्र राजेंद्र प्रथम (1012-1044) सिंहासनारूढ़ हुए। राजेंद्र प्रथम भी अत्यंत शक्तिशाली सम्राट् थे।
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राजाधिराज प्रथम (1018-1054) राजेंद्र का उत्तराधिकारी था। उसका अधिकांश समय विद्रोहों के शमन में लगा।
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चोल वंश का अंतिम राजा राजेंद्र तृतीय (1246-1279) हुआ।

 

चोल कालीन अन्य कर
आयम राजस्व कर
मरमज्जाडि वृक्ष कर
कडमै सुपारी पर कर
मनैइरै गृह कर
कढै़इरै व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर लगने वाला कर
पेविर तेलघानी कर
किडाक्काशु नर पशुधन कर
कडिमै लगान
पाडिकावल ग्राम सुरक्षा कर
वाशल्पिरमम द्वार कर
मगन्मै व्यवसाय कर
आजीवक्काशु आजीविका पर लगने वाला कर

VSDS-2