महाराष्ट्र में भक्ति आन्दोलन

महाराष्ट्र में भक्ति आन्दोलन

मध्यकाल में भक्ति आन्दोलन को विकसित करने तथा लोकप्रिय बनाने में महाराष्ट्र के सन्तों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। महाराष्ट्र में भक्ति पंथ ‘पण्ढरपुर’ के मुख्य देवता ‘विठोवा’ या ‘बिट्ठल’ के मन्दिर के चारों ओर केन्द्रित था। विट्ठल या विठोवा को कृष्ण का अवतार माना जाता था, इसलिए यह आन्दोलन पण्ढरपुर आन्दोलन के रूप में प्रसिद्ध हुआ महाराष्ट्र में भक्ति आन्दोलन मुख्य रूप से दो सम्प्रदायों में विभक्त था |
वारकरी सम्प्रदाय – पण्ढरपुर के विट्ठल भगवान के सौम्य भक्तों का सम्प्रदाय।
धरकरी सम्प्रदाय – भगवान राम के भक्तों का सम्प्रदाय.

महाराष्ट्र के भक्त/ संत / प्रवर्तक

  • नामदेव 1270-1350 ई (नामदेव, संत ज्ञानेश्वर के समकालीन थे। इनका जन्म एक दर्जी परिवार में हुआ था। प्रारम्भ में ये डाकू थे। ये क्रान्तिकारी स्वभाव के थे। उनका मार्ग निर्गुण भक्ति का था। उन्होंने जाति व्यवस्था तथा छुआछूत का ज़ोरदार खण्डन किया और ईश्वर की एकता पर बल दिया।)
  • ज्ञानेश्वर (ज्ञानदेव) 1271-1296 ई. (महाराष्ट्र के भक्ति आंन्दोलन को लोकप्रिय बनाने में ‘ज्ञानेश्वर’ का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इन्होंने मराठी भाषा में श्रीमद्भागवत पर ‘ज्ञानेश्वरी’ नामक टीका लिखी)
  • एकनाथ 1533-1598 ई (एकनाथ का जन्म ‘पैठन’ (औरंगाबाद) में हुआ था। इन्होंने पहली बार ‘ज्ञानेश्वरी’ का विश्वसनीय संस्करण प्रकाशित करवाया। इन्होंने मराठी भाषा में ‘भावार्थ रामायण’ की रचना की।)
  • तुकाराम 1599-1650 ई (तुकाराम शिवाजी के समकालीन थे। इनका जन्म 1608 ई. में पूना के निकट ‘देही’ नामक परिवार में हुआ था। तुकाराम ने निर्गुण ब्रह्मा को स्वीकार किया तथा हिन्दू-मुसलमान एकता पर बल दिया। )
  • रामदास 1608-1681 ई.(इनका जन्म 1608 ई. में हुआ थ। ये शिवाजी के आध्यात्मिक गुरु थे। इनकी महत्त्वपूर्ण रचना ‘दासबोध’ हैं)