इस भावना से किया काम कभी असफल नहीं होता

swami vivekanandaji11 04 12 2015

संस्कृत के विख्यात विद्वान प्रोफेसर पाल डायसन के निमंत्रण पर विवेकानंद स्विटरज़रलैंड से जर्मनी गए। उपनिषद, वेदांत दर्शन और शंकर भाष्य पर दोनों में विचार विनिमय हुआ।चर्चा के दौरान प्रोफेसर डायसन किसी काम से उठकर चले गए। थोड़ी देर बाद वे लौटे तो देखा कि विवेकानंद कविता की किताब के पन्ने पलट रहे हैं।

इस काम में वे इतने तल्लीन थे कि उन्हें प्रोफेसर की आहट भी नहीं सुनाई दी। पुस्तक समाप्त हो गई तो स्वामी जी ने उन्हें अपने पास बैठे देखा। बोले, क्षमा कीजिएगा मैं पढ़ रहा था। लिहाजा आपको देख न सका।

लेकिन डायसन को संदेह हुआ कि स्वामीजी ने जानबूझकर मुझे उपेक्षित किया। इसलिए विवेकानंद ने उन्हें पुस्तक में पढ़ी हुई कविताएं सुनानी शुरू कर दीं। अंततः प्रोफेसर महोदय विस्मित होकर बोले, आपने यह पुस्तक जरूर पढ़ी होगी नहीं तो यह कैसे संभव है कि सौ पृष्ठों की पुस्तक आधे घंटे में याद हो जाए।

एकाग्रता की साधना ही योग है। एकाग्र चित्त होकर जैसे ही आप किसी काम में लगते हैं, आधा काम आरंभ में ही हो जाता है।

संक्षेप में

कोई भी काम यदि एकाग्रता से किया जाए तो अवश्य ही पूरा होता है। ध्यान रखें एकाग्रता दिखावटी नहीं होनी चाहिए।